सुबह की शुरुआत एक कप चाय के साथ हो जाये तो इससे बेहतर कुछ नहीं हो सकता।
उसी आस में हमारा रोज़ का आसरा हुआ करता था , शर्मा जी की चाय की "टपरी " जी हाँ यही वर्ड फेमस है मुंबई में ।
रोज़ाना नियम था ऑफिस जाने से पहले पहुंच जाना, कुछ अख़बार की सुर्खियों पर नज़र दौड़ना।
इस नियम में एक खास बात होती है कि ठीक उसी समय कुछ जाने पहचाने चेहरों से आपका रोज़ सामना होता है , जिनको आप न तो नाम से जानते है ना ही काम से , आपस में कोई बात भी नहीं होती लेकिन एक अनकही कनेक्टिविटी रहती है ।
उन्ही चेहरों में वो दो थे , हाँ दो ही थे वो , हाँथ में नोटबुक और एक किताब रहती थी हमेशा, देखने से लगता था की पास की ही किसी कोचिंग में पढ़ते होंगे उम्र क़रीब 18 -20 साल के बीच होगी। हमारी जगह फिक्स थी , हमारे कंधे पर हमेशा बैग रहता था और अख़बार में खबर पड़ते समय हम एक पैर पिलर से टिकाकर खड़े रहते थे, और वो दोनों मेरे सामने।
रोज़ाना की तरह हम सुर्खिया पढ़ रहे थे तभी "भईया ये वाली बुक होगी क्या" पीछे से आती आवाज़ कानों में पड़ी , हमने अनसुना किया ।
तभी देखा सामने खड़े दोनों लड़को में से एक जो दीवार के सहारे खड़ा था धीरे से सीधा खड़ा हो गया और उसकी निगाह मेरे पीछे के किताबों की दुकान पर टिक गई।
उसने धीरे से अपने साथी के कान में कुछ फुसफुसाया , उसका साथी जो पूरी तरह अपने फ़ोन में तल्लीन था , एक झटके के साथ अपनी गर्दन को उठाया और उसकी आँखों में चमक साफ़ दिख रही थी। अब तो हमसे भी न रहा गया हमने भी पेपर हाथ में ही पकडे धीरे से पीछे की तरफ गर्दन घुमा के देखी , एक मोहतरमा बगल की किताब की दुकान पर कोई किताब के बारे में पूछ रहीं थीं। शकल तो नहीं दिख रही थी लेकिन कानों में जो बालियाँ थीं वो बार बार गालों को टच कर रही थीं , किताब के पन्नों को पलटते समय कभी कभी वो अपने हांथों से अपने चेहरे पर गिरते हुए बालों को पीछे की तरफ कर देतीं। लड़कियों में गज़ब का ऑब्ज़र्वेशन पवार होता है , समझ बहुत जल्दी जाती हैं , लकिन ज़ाहिर नहीं होने देतीं। उन मोहतरमा ने भी शायद ऑब्ज़र्व कर लिया और जल्द ही वहां से चली गयीं। हम लोग उन्हें ऑब्ज़र्व कर रहे थे , और वो हमें।
हमने उन दोनों लड़को को देखा , उन दोनों ने एक दूसरे को देखा और एक मुस्कान पास की आपस में, जैसे दिव्य दर्शन हो गए हों और आज का दिन सफल हो गया हो।
हमने अपनी घड़ी पर निगाह डाली , ऑफिस की बस के आने का समय हो गया था। जल्दी से चाय ख़तम की और पेपर साइड में रख के चाय के पैसे देने के लिये बढ़े ।
मिश्रा जी बड़े धार्मिक आदमी थे , रोज़ सुबह पहली चाय और एक गिलास पानी सूर्य देवता को चढ़ाते , प्रार्थना करते तब कही जाकर ग्राहकों का नम्बर आता।
बड़े से भगोने में चाय बनाते समय , कड़छी चलाते रहते और गुनगुनाते रहते " श्रीमन नारयण , नारयण, नारयण"
हमने चाय के पैसे दिए और बढ़ लिये । आज तो हमने भी मन ही मन कहा " नारायण !!! नारायण !!!
उसी आस में हमारा रोज़ का आसरा हुआ करता था , शर्मा जी की चाय की "टपरी " जी हाँ यही वर्ड फेमस है मुंबई में ।
रोज़ाना नियम था ऑफिस जाने से पहले पहुंच जाना, कुछ अख़बार की सुर्खियों पर नज़र दौड़ना।
इस नियम में एक खास बात होती है कि ठीक उसी समय कुछ जाने पहचाने चेहरों से आपका रोज़ सामना होता है , जिनको आप न तो नाम से जानते है ना ही काम से , आपस में कोई बात भी नहीं होती लेकिन एक अनकही कनेक्टिविटी रहती है ।
उन्ही चेहरों में वो दो थे , हाँ दो ही थे वो , हाँथ में नोटबुक और एक किताब रहती थी हमेशा, देखने से लगता था की पास की ही किसी कोचिंग में पढ़ते होंगे उम्र क़रीब 18 -20 साल के बीच होगी। हमारी जगह फिक्स थी , हमारे कंधे पर हमेशा बैग रहता था और अख़बार में खबर पड़ते समय हम एक पैर पिलर से टिकाकर खड़े रहते थे, और वो दोनों मेरे सामने।
रोज़ाना की तरह हम सुर्खिया पढ़ रहे थे तभी "भईया ये वाली बुक होगी क्या" पीछे से आती आवाज़ कानों में पड़ी , हमने अनसुना किया ।
तभी देखा सामने खड़े दोनों लड़को में से एक जो दीवार के सहारे खड़ा था धीरे से सीधा खड़ा हो गया और उसकी निगाह मेरे पीछे के किताबों की दुकान पर टिक गई।
उसने धीरे से अपने साथी के कान में कुछ फुसफुसाया , उसका साथी जो पूरी तरह अपने फ़ोन में तल्लीन था , एक झटके के साथ अपनी गर्दन को उठाया और उसकी आँखों में चमक साफ़ दिख रही थी। अब तो हमसे भी न रहा गया हमने भी पेपर हाथ में ही पकडे धीरे से पीछे की तरफ गर्दन घुमा के देखी , एक मोहतरमा बगल की किताब की दुकान पर कोई किताब के बारे में पूछ रहीं थीं। शकल तो नहीं दिख रही थी लेकिन कानों में जो बालियाँ थीं वो बार बार गालों को टच कर रही थीं , किताब के पन्नों को पलटते समय कभी कभी वो अपने हांथों से अपने चेहरे पर गिरते हुए बालों को पीछे की तरफ कर देतीं। लड़कियों में गज़ब का ऑब्ज़र्वेशन पवार होता है , समझ बहुत जल्दी जाती हैं , लकिन ज़ाहिर नहीं होने देतीं। उन मोहतरमा ने भी शायद ऑब्ज़र्व कर लिया और जल्द ही वहां से चली गयीं। हम लोग उन्हें ऑब्ज़र्व कर रहे थे , और वो हमें।
हमने उन दोनों लड़को को देखा , उन दोनों ने एक दूसरे को देखा और एक मुस्कान पास की आपस में, जैसे दिव्य दर्शन हो गए हों और आज का दिन सफल हो गया हो।
हमने अपनी घड़ी पर निगाह डाली , ऑफिस की बस के आने का समय हो गया था। जल्दी से चाय ख़तम की और पेपर साइड में रख के चाय के पैसे देने के लिये बढ़े ।
मिश्रा जी बड़े धार्मिक आदमी थे , रोज़ सुबह पहली चाय और एक गिलास पानी सूर्य देवता को चढ़ाते , प्रार्थना करते तब कही जाकर ग्राहकों का नम्बर आता।
बड़े से भगोने में चाय बनाते समय , कड़छी चलाते रहते और गुनगुनाते रहते " श्रीमन नारयण , नारयण, नारयण"
हमने चाय के पैसे दिए और बढ़ लिये । आज तो हमने भी मन ही मन कहा " नारायण !!! नारायण !!!
Again a good one. You have fine observation skills
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ReplyDeleteहा हा हा। sid भाई, अपने शर्मा जी का भी कुछ चरित्र चित्रण करो यार। :-)
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