Saturday, April 7, 2018

मुँहनोचवा

कैसा था वो मुँहनोचवा

जिसको भी देखो उसके ज़बान पर यही एक सवाल था।  बातों , अफवाहों का सिलसिला रुक ही नहीं रहा था।  सभी के मन में कहीं न कहीं एक डर  तो था ही।

खौफ का आलम ऐसा कि लोगों ने छत पर सोना तक छोड़ दिया था। घरों - मुहल्ले के बच्चों को  विशेष हिदायत दी गई थी कि शाम को अँधेरा होने से पहले ही घर के अंदर। इसी माहोल में एक दिन -

"टीलू !! बेटा ज़रा दौड़ के जाके नुक्कड़ वाली दुकान से अदरख ले आ , ख़तम हो गई है।" ऑन्टी जी ने कहा
" माँ , मैच चल रहा है , लास्ट के 10 ओवर बचे हैं  देख लेने दो ना , फिर जाता हूं " टीलू ने कुछ खीझते हुए कहा
" बेटा जा नहीं तो वो भूअर दुकान बंद कर के चला जायेगा, इस मुए मुँहनोचवे ने तो सबकी नाक में दम  कर रखा है"

अनमना  होकर टीलू  शोएब की स्पीड से भागता हुआ जा रहा था भूअर की दुकान पर कि जल्दी से वापस आकर मैच देखेगा। सामने से पिताजी आ रहे थे , रोका उसे और सुना दी दो बात और वो इसलिए , कि जल्दी में पैर में बिना चप्पल पहने निकल लिए थे महाराज।  इसलिए कहते हैं बेटा दुर्घटना से देर भली।

बहरहाल इससे पहले कि इन्क्वाइरी शुरू होती तभी दूबे अंकल ने पिताजी को आवाज़ दी और उनकी तरफ आने लगे , टीलू  धीरे से सरक लिये।

भूअर की दुकान पर पहुंचे , अदरख ली और वापस भाग कर आने लगे इस बार सतर्क थे कहीं पिताजी से सामना ना हो जाये।
देखा पिताजी , दूबे अंकल , गुप्ता अंकल आपस में बातें कर रहे है।
कालोनी का नक्शा कुछ ऐसा था कि सड़क से एक पतली सी गली थी और गली के बाद एक बड़ा सा मैदान जो की चारों तरफ मकानों से घिरा हुआ था।

अमूमन कोई अगर देखे तो शायद अंदाज़ा लगाना मुश्किल हो की इतनी बड़ी कालोनी होगी अंदर।
टीलू ने ऑन्टी को अदरख हैंडओवर की और तल्लीन हो गया मैच में फिर से एक बार , अब मैच की पहली इनिंग ख़तम होने वाली थी और 7 ओवर बचे थे।

" पापा थे क्या बहार ?" आंटी ने पूछ
" हाँ , थे " टीलू  का उत्तर

मैच की पहली इनिंग ख़तम हो चुकी थी अब टीलू भी तफरी के लिए बाहर आ गए , देखा कालोनी के  बीच के  मैदान में काफी लोग जमा हो  चुके थे।

उसने भी सोचा की चलो देखते है माजरा क्या है , वैसे भी मैच की दूसरी इनिंग शुरू होने में अभी समय था।  नज़र उठा के इधर - उधर देखा बिल्लू अपनी छत पर दिखा , जो वहां से दो घर छोड़ के रहता था।  इशारे से बुलाया उसको , वो भी आ गया।  अब टीलू और बिल्लू मैदान के बीच में पहुंच गए जहां पहले से ही लोग मौजूद थे और चर्चा का विषय था " मुँहनोचवा"।

गुप्ता अंकल ने कहा  " भाई, कल के अख़बार में आया था की IIT  कानपुर के वैज्ञानिक तो बोल रहे हैं की ऐसी कोई चीज़ हो ही नहीं सकती , पैर में इतनी भारी चीज़ बाँधकर उड़ना तो क्या उछलना भी असंभव हैं"। 

" लेकिन आप ने देखा नहीं , लोगों की फ़ोटो छपी थी , गले और गालों पर खरोंच के निशान भी थे , वो कैसे अये "     दूबे जी ने अपना तर्क दिया।

 "ये तो बात है ", कई लोगों ने हाँ में हाँ मिलाई।

 एक सज्जन बोले कल टीवी पर एक रिपोर्टर ने एक से पूछा " क्या आपने मुँहनोचवा को देखा है " ?
  वो बोला  " हाँ देखा है "  रिपोर्टर ने पूछा कैसा दिखता है, तो वो बोला
  " वो इन्विंसिबल है " इस बात पर सभी लोग ठहाका लगाकर हंसने लगे।

" तुम दोनों क्या खीस निपोर रहे हो " यादव जी ने  टीलू और बिल्लू को देख कर कहा।

" कुछ नहीं अंकल " दोनों को लगा शायद गलत टाइम पर आ गए

  तभी कोई जोर से चिल्लाया  " लाइट चली गई "  मनो पहाड़ गिर गया हो। 

 अब तो धीरे - धीरे कर के सभी घरों से लोग बहार आना शुरू हो गए और पार्क की ओर बढ़ने लगे , अच्छा       ख़ासा  माहोल हो गया।

  "यादव जी , अपने वकील साहब नहीं दिख रहे हैं" हल्की सी मुस्कान के साथ गुप्ता जी ने पूछा।

   यादव जी ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी , वो भी गुप्ता जी की मंशा समझ रहे थे।

  दरअसल हुआ कुछ यूँ था की कुछ दिन पहले  यादव जी और वकील साहब में कुछ दिनों पहले कहा - सुनी हो गई और नौबत यहाँ तक आ गई कि अगर   मुहल्ले वाले नहीं  बीच में नहीं आते तो बात बहुत आगे बढ़ जाती।  तब से दोनों में बोलचाल बंद है। 

   किसी ने जाकर वक़ील साहब के घर का दरवाज़ा खटखटाया , वो घर की पहली मंज़िल पर बालकनी में आए,      बनियान और लुंगी पहनें हुए थे , नीचे झाँका।

   पार्क से गुप्ता जी ने आवाज़  दी और उनको बुलाया और कहा " क्या कर रहे है अभी तो लाइट भी काट गई है "

   अभी ये सब चल ही रहा था कि ऑन्टी जी ने टीलू को आवाज़ दी और कहा  " जाकर अचार का ये जार शर्मा     आंटी  जी को दे आ "

    टीलू ने आंटी के घर गया , दरवाज़ा उनकी बेटी रिंकी ने खोला
     " मम्मी टीलू आया है "

     आंटी ने अंदर से ही आवाज़ दी  " आती हूँ " और फिर कुछ सेकंड के बाद बाहर आई

     " और बेटा कैसा है , क्या है ये "

     " मम्मी ने ये अचार भेजा है "

     " पढ़ाई कैसी चल रही है " आंटी ने जैसे ही पूछा , टीलू को लगा जैसे किसी ने घड़ों पानी उसके ऊपर  दाल           दिया हो।  पढ़ाई की बात , वो भी इस समय उसे बहुत नागवार लगी।
     
     " ये आज पार्क में इतने भीड़ क्यों लगी है ? क्या चल रहा है। आंटी की क्वेरी

      " सब लोग मुँहनोचवा की बातें कर रहे है , देखा किसी ने नहीं है " टीलू का एक समझ भरा जवाब

     " हमने तो देखा है " रिंकी जो इतने देर से चुप थी तपाक  से बोली

      " अच्छा जी कहा देख लिया तुमने "  टीलू  की जिज्ञासा ने पंख फ़ैलाने शुरू कर दिये

      " तुम जो छत पर से झांकते हो तो पूरे मुँहनोचवे की तरह लगते हो " और रिंकी खिलखिला के हंस दी
      अपने टीलू  भाई को ऐसी प्रतिक्रिया की उम्मीद नहीं थी , थोड़ा सा सकुचा से गये और कुछ बोल न पाए।               संस्कारी लड़के जो ठहरे।
      " ठीक है ऑन्टी जी , जा रहे हैं हम " बोलते हुए शराफत के साथ निकल लिए वहां से।

    इधर पार्क में वकील साहब अये सबने उनकी भी राय जाननी चाही तो बोले " भाई , कानून में तो ऐसा कोई           प्रावधान है ही नहीं , जब कोई है ही नहीं तो क्या करेंगे आप "
   
   कुछ लोगों ने मन ही मन सोचा  " अरे यार , इनसे राय पूछे , ये तो कचहरी खोल के बैठ गए "

    गुप्ता जी ने कहा " भाई , यादव जी से भी तो पूछिये , उनकी क्या राय है "
    " हम क्या पूछे , ये तो ख़ुद ही आयकर विभाग संभल रखा है , और कानून की समझ क्या काम है " वकील          साहब बोले
    " अब रहने भी दीजिये , क्यों मुँह खुलवा रहे हैं हमारा " यादव जी ने रोष में आकर कहा।

     बात को बढ़ता हुआ देख दूबे जी बोले " अरे भाई , जाने दीजिये, जो हो गया सो हो गया मिट्टी  डालिये पिछली       बातों पर "
    यादव जी ने भी बात को सम्हाला बोले " चलिए चाय पीने चलते हैं , रुकिए हम बोल के आते हैं "
     " आप क्यों जायेंगे , रुकिए हम अपने मुंशी जी से बोलते है , आप यही रहिये " वकील साहब बोले।

    बस इतना सुनना था कि यादव जी ने स्वीकृति में सर हिलाया और वकील साहब भी मुस्कुराने लगे।

    चाय आ गई , बातें फिर से चलने लगी , सभी लोगो ने अपने अपने विचार रखे , बीच बीच में ठहाके भी लगते         रहे।

     तभी कोई फिर जोर से चिल्लाया  " लाइट आ  गई "

     बच्चे तो बच्चे बड़े भी आज चिल्ला पड़े लाइट आ जाने पर , और क्यों न हो मैच की दूसरी इनिंग जो शुरू होने       वाली थी।

    कोई कुछ भी कहे , लोगों को उस थोड़ी सी देर में मिलवाया , साथ मिल के कुछ पल के लिए लोग हंस बोल          लिए , कुछ ने तो आपस में कुछ दिलों की बातें भी कर ली, कुछ ने निगाहों  निगाहों  में बातें कर लीं।  जैसा भी       था हमारे लिए तो हीरो था।

    ऐसा था मुँहनोचवा ~ 

Sunday, April 1, 2018

एक प्याली चाय

सुबह की शुरुआत एक कप चाय के साथ हो जाये तो इससे बेहतर कुछ नहीं हो सकता।

उसी आस में हमारा रोज़ का आसरा हुआ करता था , शर्मा  जी की चाय की "टपरी " जी हाँ यही वर्ड  फेमस है मुंबई में ।

रोज़ाना नियम था ऑफिस जाने से पहले पहुंच जाना, कुछ अख़बार की सुर्खियों पर नज़र दौड़ना।
इस नियम में एक खास बात होती है कि ठीक उसी समय कुछ जाने पहचाने चेहरों से आपका रोज़ सामना होता है , जिनको आप न तो नाम से जानते है ना ही  काम से , आपस में कोई बात भी नहीं होती लेकिन एक अनकही कनेक्टिविटी रहती है ।

उन्ही चेहरों में वो दो थे , हाँ दो ही थे वो  , हाँथ में नोटबुक और एक किताब रहती थी हमेशा, देखने से लगता था की पास की ही किसी  कोचिंग में पढ़ते होंगे उम्र क़रीब 18 -20 साल के बीच होगी। हमारी जगह फिक्स थी , हमारे कंधे पर हमेशा बैग रहता था और अख़बार में खबर पड़ते समय हम एक पैर पिलर से टिकाकर खड़े रहते थे, और वो दोनों मेरे सामने।

 रोज़ाना की तरह हम सुर्खिया पढ़ रहे थे तभी  "भईया ये वाली बुक होगी क्या"  पीछे से आती आवाज़ कानों में पड़ी , हमने अनसुना किया ।

तभी देखा सामने खड़े दोनों लड़को में से एक जो दीवार के सहारे खड़ा था धीरे से सीधा खड़ा हो गया और उसकी निगाह मेरे पीछे के किताबों की दुकान पर टिक गई।

 उसने धीरे से अपने साथी के कान में कुछ फुसफुसाया , उसका साथी जो पूरी तरह अपने फ़ोन में तल्लीन था , एक झटके के साथ अपनी गर्दन को उठाया और उसकी आँखों में चमक साफ़ दिख रही थी। अब तो हमसे भी न रहा गया हमने भी पेपर हाथ में ही पकडे धीरे से  पीछे की तरफ गर्दन घुमा के देखी , एक मोहतरमा बगल की किताब की दुकान पर कोई किताब के बारे में पूछ रहीं थीं। शकल तो नहीं दिख रही थी लेकिन कानों में जो बालियाँ थीं वो बार बार गालों को टच कर रही थीं , किताब के पन्नों को पलटते समय कभी कभी वो अपने हांथों से अपने चेहरे पर गिरते हुए बालों को पीछे की तरफ कर देतीं। लड़कियों में गज़ब का ऑब्ज़र्वेशन पवार होता है , समझ बहुत जल्दी जाती हैं , लकिन ज़ाहिर नहीं होने देतीं।  उन मोहतरमा ने भी शायद ऑब्ज़र्व कर लिया और जल्द ही वहां से चली गयीं। हम लोग उन्हें ऑब्ज़र्व कर रहे थे , और वो हमें।

हमने उन दोनों लड़को को देखा , उन दोनों ने एक दूसरे को देखा और एक मुस्कान पास की आपस में, जैसे दिव्य दर्शन हो गए हों  और आज का दिन सफल हो गया हो।

हमने अपनी घड़ी पर निगाह डाली , ऑफिस की बस के आने का समय हो गया था। जल्दी से चाय ख़तम की और पेपर साइड में रख के चाय के पैसे देने के लिये बढ़े ।

मिश्रा जी बड़े धार्मिक आदमी थे , रोज़ सुबह पहली चाय और एक गिलास पानी सूर्य देवता को चढ़ाते , प्रार्थना करते तब कही जाकर ग्राहकों का नम्बर आता।
बड़े से भगोने में चाय बनाते समय , कड़छी चलाते रहते और गुनगुनाते रहते " श्रीमन नारयण , नारयण, नारयण"

हमने चाय के पैसे दिए और बढ़ लिये ।  आज तो हमने भी मन ही मन कहा  " नारायण !!! नारायण !!!

Wednesday, March 21, 2018

समय का नियम


समय का नियम है कि वो चलता रहता है , निरंतर , बिना थके , बिना रुके। 
हम घड़ी की सुइयों से उसे नाप तो सकते हैं , लेकिन क्या ऐसा हो सकता है कि घड़ी की उन सुइयों  के बंद होते ही समय भी रुक जाए , नहीं !!!

प्रतापगढ़ में क्लास 5th तक हम रिक्शे से स्कूल जाते थे और 6th से साईकिल मिलने के बाद स्वतंत्र थे , सुबह - सुबह किसी और की वजह से नियम में बंधने से तो अच्छा है की  अपनी दिनचर्या  खुद ही बनाई जाये।  परन्तु हमारे छोटे भाई जो संत फ्रांसिस में पढ़ते थे वो रिक्शे से ही जाया करते थे।

एक दिन किन्ही कारणवश उनका रिक्शेवाला नहीं आया तो हमे ज़िम्मेदारी सौपी गई उनको स्कूल पहुंचने की।
 रोड़ पर आकर हमने एक रिक्शा किया और चल पड़े, ठण्ड का समय था और कोहरा भी।  हमारा रिक्शा चौक घंटाघर से हॉस्पिटल की ओर मुड़ा , अभी G I C  के सामने पंहुचा ही था कि "धप " कर के कुछ गिरने की आवाज़ आई जो सुबह के सन्नाटे में बिलकुल क्लियर सुनाई दी।  साथ में बैठे छोटे भाई के बस्ते से एक पैकेट सड़क पर गिर गया था। हमने तुरंत रिक्शा रुकवाया, दौड़ कर पीछे की तरफ गए , देखा एक व्यक्ति ने वो पैकेट उठाकर अपने हाथ में रख लिया था ।  हमने तुरंत उस व्यक्ति से कहा " ये पैकेट हमारा है " उसने झट से वो पैकेट हमें वापस कर दिया और  हम  पैकेट वापस लेकर एक विजयी योद्धा की तरह वापस गए।  
ये तो रहा वर्ज़न उस कहानी का जो कि 6th क्लास के उस लड़के ने घर लौटकर सबको सुनाई।  
आप सब सोच रहे होंगे कि इसमें ऐसा क्या हो गया!! दोस्तों बहुत कुछ ऐसा हुआ जो वो 6th क्लास का लड़का नहीं देख पाया। 

वही 6th क्लास का लड़का यानि हम , आज उस घटना का वो पहलू  बताने जा रहे हैं , जो उस समय अनदेखा रह गया। 
जिस व्यक्ति का अभी - अभी हमने  ज़िक्र किया था , वो एक 50 साल के ऊपर का , दिखने में एक बूढ़ा था।  ठंढ से बचने के लिए उसने मफ़लर को अपने सर से लेते हुए अपने कानो को कवर करते हुए गले में लपेट रखा था , एक नीले रंग का पुराना सा जर्जर कोट और सफ़ेद धोती पहने हुआ था।  दोनों  हाथों  को वो पीछे की ओर कर के चल रहा था , क्योकि जब हमें ठण्ड लगती है और हमारे जिस्म पर के कपडे हमें उस ठण्ड से नहीं बचा पाते तब हमें  ऐसी ही मुद्रा बनाकर खुद को तसल्ली दिलाना पड़ता है।  पैकेट को उस बूढ़े से लेते समय एक छड़ के लिए हमने उसकी आँखों में देखा था वो आँखे बोल रहीं थीं कि-
 " बाबू , ये पैकेट हमारा नहीं है , लेकिन क्या आज के लिये आप मुझे ये दे सकते हैं
उस पैकेट में खाने का कुछ सामान था और सच पूछिए तो उस समय दुनिया में सबसे ज्यादा उसकी कीमत वही बूढा समझता था।
आज अगर कोई मुझसे पूछे कि " सिद्धार्थ , अपने माज़ी का तुम क्या चेंज करना चाहोगे "

हम कहेंगे  "एकबार फिर से वही ले चलो, हमें  उस बूढ़े को वो पैकेट वापस करकर के आने दो "

लेकिन क्या ऐसा हो सकता है ? समय रुक सकता है ? नहीं !!!

फ़रवरी में प्रतापगढ़ जाने का मौका मिला, बहुत कुछ तो नहीं बदला है , GIC के  सामने से गुजरते समय उस बूढ़े को खोज रहा था , लेकिन भीड़ में वो कहीं खो गया था शायद। अगर कही आप को मिल जाये तो ज़रूर बताइयेगा।

  समय आज भी चल रहा है निरंतर , बिना थके , बिना रुके।

  माज़ी= past

Monday, March 19, 2018

वो ग़ुमनाम शख्श

"खुशबू  जैसे  लोग मिले अफ़साने में , एक पुराना  ख़त खोला अन्जाने में "

यहाँ  कोई ख़त  तो नहीं है , लेकिन  एक वाक्या  है।

बात है सन 2003 की , हम नागपुर में MCA  की पढाई कर रहे थे , मई का महीना था और कुछ ही दिनों में सेमेस्टर एग्जाम स्टार्ट होने वाले थे।
सेकंड ईयर में एक इंटरनल प्रोजेक्ट सबमिट करना रहता था। उसी सिलसिले में  एक दोपहर हम अपने हॉस्टल से अपने मित्र के घर जाने के लिए निकले।
हमारे मित्र शांतनु "डे स्कॉलर " थे और हमारे प्रोजेक्ट पार्टनर भी , हॉस्टल के पास बस स्टॉप से बस पकड़ी  जो हमें "टी -पॉइंट " पर ड्राप कर दी।
वहां से आगे जाने के लिए हम दूसरी बस का इंतज़ार करने लगे। रविवार का दिन था , ऊपर से नागपुर की झुलसा देने वाली गर्मी , बसों की फ्रीक्वेंसी काफी कम  थी। करीब 10 -15  मिनट हो गए थे इंतज़ार करते हुए , तभी एक सज्जन बाइक पर आये और हमसे एक वर्ड बोला " लिफ़्ट " ? इतना सुनना था कि हम  हो लिए उनके साथ। विकट गर्मी होने के कारण उन्होंने अपना चेहरा सफ़ेद कपड़े से पूरी तरह ढक रखा था और सिर्फ एक काला  चश्मा बाहर की ओर झांक रहा था।  रस्ते में उन्होंने हमसे कुछ नहीं कहा और ही हमने , हम तो  प्रसन्न थे की चलो लिफ्ट मिल गई और मन ही मन उनका धन्यवाद् कर रहे थे। 
10 मिनट में हमें जहां जाना था वहां पहुँच गये , बाइक से उतरने के बाद हमने जैसे ही उनको थैंक - यू  बोला , उन सज्जन ने एक बात ऐसी बोली जो मेरे कानो में शायद हमेशा गूंजती रहेगी , उन्होंने कहा  " थैंक - यू  बोलने की ज़रुरत नहीं है , आप भी कभी किसी की हेल्प कर दीजियेगा "
इसके पहले कि  हम रेस्पॉन्ड कर पाते , उन सज्जन ने बाइक आगे बढ़ा दी और हम उनको देखते ही रह गए। 

कैसा होता है , कि जिस शख्श का नाम नहीं मालूम , शकल तक देखी हो वो लाइफ का एक लेसन सिखा गया।  15 साल हो गए इस बात को  लेकिन  ज़ेहन में ये बात अभी भी इतनी फ्रेश है , लगता है जैसे कल की ही बात हो। रात को ऑफिस से लौटते समय एक सज्जन को लिफ्ट देने के बाद हम भी जैसे ही आगे बढ़े ये बात याद गई , सोचा आप सभी के साथ शेयर कर लूँ।