Wednesday, March 21, 2018

समय का नियम


समय का नियम है कि वो चलता रहता है , निरंतर , बिना थके , बिना रुके। 
हम घड़ी की सुइयों से उसे नाप तो सकते हैं , लेकिन क्या ऐसा हो सकता है कि घड़ी की उन सुइयों  के बंद होते ही समय भी रुक जाए , नहीं !!!

प्रतापगढ़ में क्लास 5th तक हम रिक्शे से स्कूल जाते थे और 6th से साईकिल मिलने के बाद स्वतंत्र थे , सुबह - सुबह किसी और की वजह से नियम में बंधने से तो अच्छा है की  अपनी दिनचर्या  खुद ही बनाई जाये।  परन्तु हमारे छोटे भाई जो संत फ्रांसिस में पढ़ते थे वो रिक्शे से ही जाया करते थे।

एक दिन किन्ही कारणवश उनका रिक्शेवाला नहीं आया तो हमे ज़िम्मेदारी सौपी गई उनको स्कूल पहुंचने की।
 रोड़ पर आकर हमने एक रिक्शा किया और चल पड़े, ठण्ड का समय था और कोहरा भी।  हमारा रिक्शा चौक घंटाघर से हॉस्पिटल की ओर मुड़ा , अभी G I C  के सामने पंहुचा ही था कि "धप " कर के कुछ गिरने की आवाज़ आई जो सुबह के सन्नाटे में बिलकुल क्लियर सुनाई दी।  साथ में बैठे छोटे भाई के बस्ते से एक पैकेट सड़क पर गिर गया था। हमने तुरंत रिक्शा रुकवाया, दौड़ कर पीछे की तरफ गए , देखा एक व्यक्ति ने वो पैकेट उठाकर अपने हाथ में रख लिया था ।  हमने तुरंत उस व्यक्ति से कहा " ये पैकेट हमारा है " उसने झट से वो पैकेट हमें वापस कर दिया और  हम  पैकेट वापस लेकर एक विजयी योद्धा की तरह वापस गए।  
ये तो रहा वर्ज़न उस कहानी का जो कि 6th क्लास के उस लड़के ने घर लौटकर सबको सुनाई।  
आप सब सोच रहे होंगे कि इसमें ऐसा क्या हो गया!! दोस्तों बहुत कुछ ऐसा हुआ जो वो 6th क्लास का लड़का नहीं देख पाया। 

वही 6th क्लास का लड़का यानि हम , आज उस घटना का वो पहलू  बताने जा रहे हैं , जो उस समय अनदेखा रह गया। 
जिस व्यक्ति का अभी - अभी हमने  ज़िक्र किया था , वो एक 50 साल के ऊपर का , दिखने में एक बूढ़ा था।  ठंढ से बचने के लिए उसने मफ़लर को अपने सर से लेते हुए अपने कानो को कवर करते हुए गले में लपेट रखा था , एक नीले रंग का पुराना सा जर्जर कोट और सफ़ेद धोती पहने हुआ था।  दोनों  हाथों  को वो पीछे की ओर कर के चल रहा था , क्योकि जब हमें ठण्ड लगती है और हमारे जिस्म पर के कपडे हमें उस ठण्ड से नहीं बचा पाते तब हमें  ऐसी ही मुद्रा बनाकर खुद को तसल्ली दिलाना पड़ता है।  पैकेट को उस बूढ़े से लेते समय एक छड़ के लिए हमने उसकी आँखों में देखा था वो आँखे बोल रहीं थीं कि-
 " बाबू , ये पैकेट हमारा नहीं है , लेकिन क्या आज के लिये आप मुझे ये दे सकते हैं
उस पैकेट में खाने का कुछ सामान था और सच पूछिए तो उस समय दुनिया में सबसे ज्यादा उसकी कीमत वही बूढा समझता था।
आज अगर कोई मुझसे पूछे कि " सिद्धार्थ , अपने माज़ी का तुम क्या चेंज करना चाहोगे "

हम कहेंगे  "एकबार फिर से वही ले चलो, हमें  उस बूढ़े को वो पैकेट वापस करकर के आने दो "

लेकिन क्या ऐसा हो सकता है ? समय रुक सकता है ? नहीं !!!

फ़रवरी में प्रतापगढ़ जाने का मौका मिला, बहुत कुछ तो नहीं बदला है , GIC के  सामने से गुजरते समय उस बूढ़े को खोज रहा था , लेकिन भीड़ में वो कहीं खो गया था शायद। अगर कही आप को मिल जाये तो ज़रूर बताइयेगा।

  समय आज भी चल रहा है निरंतर , बिना थके , बिना रुके।

  माज़ी= past

Monday, March 19, 2018

वो ग़ुमनाम शख्श

"खुशबू  जैसे  लोग मिले अफ़साने में , एक पुराना  ख़त खोला अन्जाने में "

यहाँ  कोई ख़त  तो नहीं है , लेकिन  एक वाक्या  है।

बात है सन 2003 की , हम नागपुर में MCA  की पढाई कर रहे थे , मई का महीना था और कुछ ही दिनों में सेमेस्टर एग्जाम स्टार्ट होने वाले थे।
सेकंड ईयर में एक इंटरनल प्रोजेक्ट सबमिट करना रहता था। उसी सिलसिले में  एक दोपहर हम अपने हॉस्टल से अपने मित्र के घर जाने के लिए निकले।
हमारे मित्र शांतनु "डे स्कॉलर " थे और हमारे प्रोजेक्ट पार्टनर भी , हॉस्टल के पास बस स्टॉप से बस पकड़ी  जो हमें "टी -पॉइंट " पर ड्राप कर दी।
वहां से आगे जाने के लिए हम दूसरी बस का इंतज़ार करने लगे। रविवार का दिन था , ऊपर से नागपुर की झुलसा देने वाली गर्मी , बसों की फ्रीक्वेंसी काफी कम  थी। करीब 10 -15  मिनट हो गए थे इंतज़ार करते हुए , तभी एक सज्जन बाइक पर आये और हमसे एक वर्ड बोला " लिफ़्ट " ? इतना सुनना था कि हम  हो लिए उनके साथ। विकट गर्मी होने के कारण उन्होंने अपना चेहरा सफ़ेद कपड़े से पूरी तरह ढक रखा था और सिर्फ एक काला  चश्मा बाहर की ओर झांक रहा था।  रस्ते में उन्होंने हमसे कुछ नहीं कहा और ही हमने , हम तो  प्रसन्न थे की चलो लिफ्ट मिल गई और मन ही मन उनका धन्यवाद् कर रहे थे। 
10 मिनट में हमें जहां जाना था वहां पहुँच गये , बाइक से उतरने के बाद हमने जैसे ही उनको थैंक - यू  बोला , उन सज्जन ने एक बात ऐसी बोली जो मेरे कानो में शायद हमेशा गूंजती रहेगी , उन्होंने कहा  " थैंक - यू  बोलने की ज़रुरत नहीं है , आप भी कभी किसी की हेल्प कर दीजियेगा "
इसके पहले कि  हम रेस्पॉन्ड कर पाते , उन सज्जन ने बाइक आगे बढ़ा दी और हम उनको देखते ही रह गए। 

कैसा होता है , कि जिस शख्श का नाम नहीं मालूम , शकल तक देखी हो वो लाइफ का एक लेसन सिखा गया।  15 साल हो गए इस बात को  लेकिन  ज़ेहन में ये बात अभी भी इतनी फ्रेश है , लगता है जैसे कल की ही बात हो। रात को ऑफिस से लौटते समय एक सज्जन को लिफ्ट देने के बाद हम भी जैसे ही आगे बढ़े ये बात याद गई , सोचा आप सभी के साथ शेयर कर लूँ।